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मेरे अल्फाज़

बिंदु

बाबा विकास

5 कविताएं

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बिंदु हूं मैं
मुझसे ही तो गुजरती हैं
अनगिनत रेखाएं
जिनका कोई अन्त नहीं
अनन्त मुझ पर ही तो है
परन्तु मैं अनन्त पर नहीं हूं
ना ही मैं अनन्त हूं
मेरा एक निश्चित-अंत है
अंत है इसलिए निश्चित है
निश्चित है इसलिए अंत नहीं है
और अनन्त....
वो तो निश्चित हो ही नहीं सकता

#बाबा विकास मिश्र दीपक
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