युवा पढ़ाई तो बुजुर्ग खेती छोड़कर यूपी गेट पहुंचे

Ghaziabad Bureauगाजियाबाद ब्यूरो Updated Tue, 01 Dec 2020 01:41 AM IST
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युवा पढ़ाई तो बुजुर्ग खेती छोड़कर यूपी गेट पहुंचे
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साहिबाबाद। वकालत और बिजनेस की किताबों से अपना भविष्य बनाने वाले नौजवान और अपनी मेहनत से धान की बुआई करने वाले किसानों के मन में कृषि कानून समेत अन्य मुद्दों पर अलग ही दर्द था। सभी अपनी-अपनी तरह से किसान आंदोलन को गति देने में जुटे हैं। अमर उजाला ने इन सभी से बात की तो किसानों की आंखें भी भर आईं।
पत्नी-बच्चे कर रहे धान की बुआई : हापुड़ निवासी कुंवरपाल का कहना है कि पिछले तीन दिनों से सड़क पर नींद ले रहा हूं। यह सिर्फ मेरे परिवार के बेहतर भविष्य के लिए है। अभी धान की बुआई का समय है लेकिन मैं यहां अपने हक की लड़ाई लड़ रहा हूूं। तो घर पर बीवी-बच्चे धान की बुआई के अलावा पशुओं का चारा करते हैं। परिवार और मैं अपनी जिम्मेदारियों को निभा रहे हैं।

पांच दिन का रसद लेकर साथ आया हूं : बिजनौर के रहने वाले राजवीर कहते हैं कि सरकार अगर पहले ही बात को मान लेती तो मैं आज सड़क पर नहीं होता। सिर्फ कहने को कृषि कानून बना दिया लेकिन हम लोग मुकदमे के लिए कोर्ट नहीं जा सकते। दर्द इस बात का है कि घर पर परिवार अकेला है। पांचों सदस्य रोजाना रात को फोन कर मेरा हाल-चाल लेते हैं। हम लोग चार साथी एक साथ आए हैं और पड़ोसियों से मैंने कहा कि भाई परिवार का ख्याल रखियो।
बेटे पूछते हैं, पापा पैसे की जरूरत हो तो भिजवा दें : बिजनौर के रहने वाले विजय सिंह 25 बीघा जमीन में गन्ने, सरसों और गेहूं उगाते हैं। वह कहते हैं कि पूरी फसल बेचने पर भी मेहनत का पैसा नहीं मिलता। जैसे तैसे करके परिवार के पोषण के अलावा पशुओं का चारा आ पाता है। ट्यूबवेल का सलाना 25 हजार और घर का सलाना 15-16 हजार रुपये के बिल ने कमर तोड़ दी है। 14 दिन में गन्ने का बकाया पैसा एक साल बाद भी नहीं मिला। अब तीन दिनों से बेटे पूछते हैं कि पापा पैसे की जरूरत है तो भिजवा दें।
गन्ने के दाम बढ़ने पर आई थी परिवार में खुशहाली : 64 वर्षीय बिजनौर निवासी महिपाल कभी गन्ने पर 80 रुपये दाम बढ़ने पर खुश हुए थे। परिवार भी अच्छे से खाने-पीने लगा था। उनका कहना है कि महंगाई और बिजली बिल के दामों ने सुकून छीन लिया। खेतों में गन्ने की बुआई करने के बाद कीमत नहीं मिलती। 2007-08 में गन्ने के पैसे बढ़े थे, इसके बाद किसी ने गन्ने का बकाया न दिलाया। बेटे परिवार की याद तो आती है लेकिन हक की लड़ाई भी लड़नी है।
मैं बॉर्डर पर तो भाई घर पर निभा रहे जिम्मेदारी : अमरोहा निवासी चौ. सोवीर सिंह कहते हैं कि तीन दिनों से मैं यहां आंदोलन की रणनीति बना रहा हूं। तो घर पर मेरे भाई परिवार की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। घर से चलते हुए मैंने सिर्फ यह कहा था कि सभी अपना ख्याल रखना लेकिन रोजाना बीवी-बच्चे फोन करके आने के बारे में पूछते हैं।
देश का भविष्य तय करने के लिए आया हूं : मेरठ कॉलेज में वकालत की अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे गौरव बालियान का कहना है कि किसान परिवार में जन्म लेने के बाद मेहनत और परेशानियों का पता चला। पढ़ाई तो बाद में हो जाएगी अब देश के अन्नदाता के हक की लड़ाई जीतनी है। दिल्ली जाकर अपने अधिकार लेकर ही मानेंगे।
किसान आंदोलन के इतिहास का बनना है हिस्सा : मेरठ निवासी बीए अंतिम वर्ष के छात्र हिमांशु शर्मा का कहना है कि मेरठ से जब किसान आंदोलन की शुरुआत हुई थी तो पहले ही दिन मैंने गाड़ी का स्टेयरिंग संभाल लिया। इससे जो भी किसान पैदल चलता दिखा था उसे गाड़ी में बैठाकर यूपी गेट ले आया। अभी तक उन्होंने 80 से अधिक किसानों को यूपी गेट पहुंचाया।
पिता के समर्पण ने किया प्रोत्साहित : मुजफ्फरनगर से भाकियू के युवा प्रवक्ता अवधेश चौधरी आंदोलन और प्रदर्शनों में सबसे ज्यादा भाग लेते हैं। उन्होंने कहा कि मैं हरियाणा से लेकर यूपी तक के सभी प्रदर्शनों में रहा। किसानी करते हुए पिता के समर्पण ने यूपी गेट तक भी पहुंचा दिया। वह बुजुर्गों को खाना खिलाने के लिए रसद सामग्री का इंतजाम करते हैं।
एमए की पढ़ाई कर अब खेती को बढ़ाने का समय : सहारनपुर निवासी गौरव कुमार एमए के छात्र हैं। उनका कहना है कि पढ़ाई पूरी कर परिवार की खेती-किसानी को आगे बढ़ाना है। अभी तक परिवार में कोई इतना पढ़ा नहीं था लेकिन फसल बिक्री में अभी जो दिक्कतें हैं उन्हें दूर करना सबसे ज्यादा जरूरी है। आंदोलन की गतिविधियों को वह सोशल मीडिया पर डालकर एक से दूसरे राज्य तक पहुंचा रहे हैं।
बाबा का साथ देने आया यूपी गेट : मेरठ निवासी आकाश चौधरी 12वीं के छात्र हैं। उनका कहना है कि बाबा दो दिनों से यूपी गेट पर अकेले थे। तो मैं भी उनका साथ देने के लिए आज यहां आ गया। अभी पढ़ाई से पहले मेरे लिए यह लड़ाई बेहद जरूरी है। बाबा कई बार प्रदर्शन में जाते थे। तो मैं भी उनके साथ जाने की जिद्द करता था।

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