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लॉकडाउन का असर: मनरेगा की जरूरत पहले से अधिक

भारत डोगरा Published by: भारत डोगरा Updated Fri, 11 Jun 2021 03:02 AM IST
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मनरेगा योजना के तहत काम करते लोग (फाइल फोटो)
मनरेगा योजना के तहत काम करते लोग (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

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आज जब देश में लॉकडाउन के प्रभावों की चर्चा फिर से हो रही है और अनेक प्रवासी मजदूर भी शहर से गांव की ओर लौट रहे हैं, एक बार फिर ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा का महत्व बढ़ गया है। पिछले वर्ष जब लॉकडाउन लगा था और प्रवासी मजदूरों के पलायन के दौर में सरकार ने राहत के विशेष पैकेजों की घोषणा की थी, तो उसमें मनरेगा के बजट में वृद्धि को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। मौजूदा स्थिति में भी सरकार को ऐसा ही करना चाहिए।
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मनरेगा में सामान्यतः कानूनी प्रावधान यह है कि मजदूरों की ओर से कार्य की मांग आने पर ही कार्य आयोजित करने की प्रक्रिया आरंभ होती है। इसमें कुछ समय लगता है। सामान्य वक्त के लिए तो यह व्यवस्था ठीक है। पर जब लोगों की आर्थिक स्थिति अधिक कमजोर है, तो प्रशासन को अपनी ओर से भी, पंचायतों के सहयोग से इस प्रक्रिया को आरंभ करने की छूट होनी चाहिए, ताकि अपेक्षाकृत कम समय में अधिक कार्य आरंभ किए जाएं। केंद्र सरकार की बड़ी जिम्मेदारी शीघ्रता से पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध करवाने की है, क्योंकि अंत में सबसे बड़ी जरूरत तो इन दिनों यही होगी कि मजदूरों के भुगतान में देरी न हो। यदि कार्य आयोजित करने की शेष सब तैयारी हो गई, लेकिन समय पर मजदूरों की मजदूरी का भुगतान भी नहीं हुआ, तब तो मूल प्रयोजन पूरा ही नहीं होता है और कई बार यही स्थिति देखी गई है।


राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी का कानून बने तो बहुत समय बीत गया, पर अब  तक इसे वैसी मान्यता नहीं मिली है, जो मिलनी चाहिए थी। उदाहरण के लिए, गारंटी शब्द का अभिप्राय ही यह है कि यदि विधिसम्मत ढंग से रोजगार नहीं मिला, तो इसके बदले में क्षतिपूर्ति या मुआवजे की राशि दी जाएगी। कानून में इसका प्रावधान भी है, (हालांकि यह कुछ कमजोर ढंग से रखा गया है) पर 95 प्रतिशत से अधिक मामलों में यह राशि नहीं दी जाती है। एनडीए सरकार के आरंभिक दौर में मनरेगा के महत्व को कम आंकने के प्रयास नजर आए, पर शीघ्र ही नजर आ गया कि कठिन दौर में तो इसका महत्व और भी बढ़ता ही जा रहा है। कोविड के दौर में तो यह और भी रेखांकित हो गया। इसके लिए बजट आवंटन बढ़ाने की मांग ने जोर पकड़ा और स्थितियां ऐसी थीं कि अन्य कटौतियों के बीच भी केंद्र सरकार को यह मांग माननी पड़ी। 

लेकिन इसके अतिरिक्त कुछ अन्य अधिक दीर्घकालीन कारण भी हैं, जो आगामी दिनों में मनरेगा के महत्व को बढ़ाने वाले हैं। जलवायु बदलाव के संकट को कम करने के लिए जहां कार्बन डाईऑक्साइड सहित विभिन्न ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की मांग जोर पकड़ेगी, तो कार्बन को सोखने की क्षमता को बढ़ाना भी बहुत जरूरी है। इसके लिए वनीकरण, स्थानीय प्रजातियों के पेड़ों को बचाना, चरागाहों की रक्षा, मिट्टी के ऑर्गेनिक तत्त्व में वृद्धि- यह सब बहुत जरूरी है। इन सभी उद्देश्यों को प्राप्त करने में मनरेगा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। जल-संरक्षण की दृष्टि से भी मनरेगा बहुत महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। मनरेगा पूरी तरह आदर्श ढंग से अधिकांश स्थानों पर चल नहीं सका, इसके बावजूद इसने अनेक स्थानों पर जल-संरक्षण, नमी संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

मुझे मनरेगा के अच्छे और बुरे, दोनों तरह के क्रियान्वयन को देश के अनेक भागों में देखने को मिला है। कुछ स्थानों पर मजदूरी देर तक न मिलने से उपजी निराशा को देखा है, तो कुछ स्थानों पर घर के पास ही मिल रही संतोषजनक मजदूरी से उपजे उत्साह को भी देखा है। मनरेगा ठीक से चले तो गांव की भलाई के कार्यों में रोजगार और मजदूरी घर के पास ही मिल जाते हैं। स्थानीय समझ और भागीदारी से गांव के अनेक विकास कार्य और पर्यावरण रक्षा के कार्य हो सकते हैं। इस तरह ग्राम स्वराज के सपने को आगे बढ़ाने में भी मनरेगा की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। गांव हरा-भरा हो जाए, चरागाहों व वृक्षों की हरियाली बढ़ जाए, तो आगे अनेक बहुत तरह के विकास कार्यों की संभावना बढ़ती है। 

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