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जितिन प्रसाद भाजपा में: कांग्रेस के लिए एक और संदेश

नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Fri, 11 Jun 2021 03:08 AM IST
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Jitin Prasad
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जितिन प्रसाद इसका इंतजार ही कर रहे थे। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले  ही वह कांग्रेस छोड़ने वाले थे। लेकिन प्रियंका गांधी वाड्रा ने तब उन्हें मना लिया था। भाजपा में उनका आना पार्टी का मनोबल बढ़ाने वाला है। जितिन प्रसाद के आने से उत्तर प्रदेश में भाजपा की संभावनाएं मजबूत होंगी या ठाकुर वर्चस्व वाली योगी सरकार से परेशान ब्राह्मण अब बड़ी संख्या में भाजपा को वोट देंगे, यह एक अलग मामला है। पर इस घटना से भाजपा को मनोवैज्ञानिक लाभ मिला है। जितिन प्रसाद कांग्रेस से ऐसे समय निकले हैं, जब भाजपा पश्चिम बंगाल में हार से बौखलाई हुई है। जो लोग तृणमूल कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए थे, वे तृणमूल में वापस लौट रहे हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय मुकुल राय को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि वह 'घर वापसी' कर सकते हैं।
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योगी आदित्यनाथ ने जितिन प्रसाद के आने का स्वागत किया है। एके शर्मा के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाले वह एक और ब्राह्मण 'चेहरा' होंगे। नौकरशाह से राजनेता बने और उत्तर प्रदेश भेजे गए शर्मा प्रधानमंत्री के भरोसेमंद हैं और योगी सरकार में उनके महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है। उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया गया है और जो प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के मामलों की देखरेख कर रहे हैं। एक समय अटकलें थीं कि शर्मा को उप-मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी दी जा सकती है। पर लगता है कि मुख्यमंत्री योगी ने इस पर रोक लगा दी है। लखनऊ में फिलहाल मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावना नहीं दिख रही। भाजपा नेतृत्व ने भी प्रदेश में नेतृत्व में बदलाव की संभावना से इन्कार किया है। लेकिन मुख्यमंत्री निशाने पर तो हैं ही। जितिन प्रसाद ऐसे समय भाजपा में शामिल हुए हैं, जब योगी की स्थिति मजबूत नहीं है। समय पर टीकों का ऑर्डर न देने से बड़ी चूक हुई है। उत्तर प्रदेश में दूसरी लहर को ठीक से न संभाल पाने की व्यापक आलोचना हुई है और पार्टी के लोगों ने भाजपा की छवि को हुए नुकसान पर नाराजगी जताई है।


कांग्रेस का निरंतर पतन कोई रहस्य नहीं है। जिन पुराने नेताओं का तीन, चार या पांच साल का राजनीतिक जीवन शेष है, वे वहीं टिके रहेंगे। उनमें से कुछ तो राज्यसभा की सीट भी पाने में कामयाब हो जाएंगे। लेकिन जिन युवा नेताओं के सामने बीस-तीस साल का राजनीतिक करिअर है, वे मान रहे हैं कि कांग्रेस में कोई भविष्य नहीं है। इससे पता चलता है कि जितिन प्रसाद और उन जैसे लोग आज किस हद तक निराशा महसूस कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने वाले सभी कांग्रेसियों (हेमंत विस्व सरमा को छोड़कर, जिन्हें असम का ताज मिला) को मनचाही चीज मिल जाती हैं। पंद्रह महीने पहले भाजपा में शामिल होने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को अब तक मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है, जिसकी वह उम्मीद कर रहे थे।

जितिन प्रसाद की भाजपा के साथ जो सहमति बनी होगी, उसके तहत वह अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ सकते हैं। कांग्रेस से चुनाव हारने वाले जितिन प्रसाद, संभव है, भाजपा की सांगठनिक ताकत के बल पर चुनाव जीत जाएं। अगर वह नहीं जीत पाते, तो भी उन्होंने अनुमान लगाया होगा कि कांग्रेस  में राजनीतिक रूप से विलुप्त होने की तुलना में भाजपा में अनिश्चित भविष्य का जोखिम कहीं बेहतर है। उनके बाहर निकलने से यह भी पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आगे नहीं बढ़ रही।

उत्तर प्रदेश का चुनाव संभवतः चतुष्कोणीय मुकाबला होगा। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में भाजपा सत्ता में नहीं है। अगर वह उत्तर प्रदेश में हारती है, और अगर इसमें राजस्थान, छत्तीसगढ़ और केरल को भी जोड़ लें, तो 250 से अधिक लोकसभा सीटों वाले राज्यों में वह सत्ता से बाहर हो जाएगी। इसी कारण वह उत्तर प्रदेश को हाथ से जाने नहीं देना चाहेगी। मायावती के अकेले चुनाव लड़ने की संभावना है और भाजपा की सीटें कम हुईं, तो बाद में वह भाजपा का समर्थन करने पर विचार कर सकती हैं। सपा और रालोद के बीच पहले ही समझौता हो चुका है और वे कुछ छोटी पार्टियों को साथ ले सकते हैं। लेकिन अखिलेश यादव 2017 की तरह कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने के मूड में नहीं दिख रहे। वह हिसाब लगाएंगे कि मुस्लिम मतदाता बंटने के बजाय भाजपा को मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी के रूप में उनकी तरफ आकर्षित होंगे, जैसा कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल के साथ हुआ। सपा ने हाल के पंचायत चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया है। 

जितिन प्रसाद का जाना कांग्रेस की अपनी सोच के बारे में भी बताता है, जिससे युवा नेता बाहर जा रहे हैं। दरअसल कांग्रेस यह मान चुकी है कि वह भाजपा की गैरमौजूदगी में ही सत्ता में लौट सकती है। यह तभी होगा, जब लोग वास्तव में भाजपा से नाराज होंगे। आज ऐसे अनेक लोग मिलेंगे, जो भाजपा से नाखुश हैं, लेकिन वे कहते हैं, 'कांग्रेस में कोई और चेहरा क्यों नहीं हो  सकता?' लेकिन ऐसा होने की संभावना नहीं है। जितिन प्रसाद के निकलने पर कुछ कांग्रेसियों ने 'कूड़ेदान में फेंके गए कचरे' या 'अवसरवादी' जैसी प्रतिक्रिया जताई। 

यानी ऐसी सोच बना ली गई है कि जो पार्टी छोड़ना चाहता है, वह छोड़ सकता है। केवल वही रह सकते हैं, जो राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करेंगे। सचिन पायलट ने अब तक पार्टी नहीं छोड़ी है। राजस्थान में पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए उन्होंने पांच साल बहुत मेहनत की और उनसे कुछ वादे किए गए थे, जिनका सम्मान नहीं किया गया। उन्हें पार्टी से जितना मिला, उससे ज्यादा उन्होंने पार्टी को दिया। अगर पार्टी का संदेश वादों को पूरा करने के लिए अनिश्चित काल तक इंतजार करने का है, तो कौन-सा युवा कड़ी मेहनत करना चाहेगा? जितिन प्रसाद ने बेशक हरा चरागाह चुना। पर कांग्रेस को जितिन के बाहर निकलने का असल संदेश नहीं भूलना चाहिए कि अनेक युवा नेता आज कांग्रेस में भविष्य नहीं देख रहे। और यह कि उनकी आखिरी उम्मीदें, जो उन्होंने पार्टी में सुधार के लिए बांधी थीं, अब धूमिल हो रही हैं। 

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